पढ़िए 6 आध्यात्मिक कहानियां, 6 spiritual stories choptaplus

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पढ़िए 6 आध्यात्मिक कहानियां, 6 spiritual stories choptaplus



 

एक सासु माँ और बहू थी।


सासु माँ हर रोज ठाकुर जी पूरे नियम और श्रद्धा के साथ सेवा करती थी।

एक दिन शरद ॠतु मेँ सासु माँ को किसी कारण वश शहर से बाहर जाना पडा।

सासु माँ ने विचार किया के ठाकुर जी को साथ ले जाने से रास्ते मेँ उनकी सेवा-पूजा नियम से नहीँ हो सकेँगी।

सासु माँ ने विचार किया के ठाकुर जी की सेवा का कार्य अब बहू को देना पड़ेगा लेकिन बहू को तो कोई अक्ल है ही नहीँ कि ठाकुर जी की सेवा कैसे करनी है।


सासु माँ ने बहू ने बुलाया ओर समझाया कि ठाकुर जी की सेवा कैसे करनी है।

कैसे ठाकुर जी को लाड़ करना है।

सासु माँ ने बहु को समझाया के बहु मैँ यात्रा पर जा रही हूँ और अब ठाकुर जी की सेवा पूजा का सारा कार्य तुमको करना है।

सासु माँ ने बहु को समझाया देख ऐसे तीन बार घंटी बजाकर सुबह ठाकुर जी को जगाना।

फिर ठाकुर जी को मंगल भोग कराना।

फिर ठाकुर जी स्नान करवाना।

ठाकुर जी को कपड़े पहनाना।

फिर ठाकुर जी का श्रृंगार करना ओर फिर ठाकुर जी को दर्पण दिखाना।

दर्पण मेँ ठाकुर जी का हंस्ता हुआ मुख देखना बाद मे ठाकुर जी राजभोग लगाना।


इस तरह सासु माँ बहु को सारे सेवा नियम समझाकर यात्रा पर चली गई।


अब बहू ने ठाकुर जी की सेवा कार्य उसी प्रकार शुरु किया जैसा सासु माँ ने समझाया था।


ठाकुर जी को जगाया नहलाया कपड़े पहनाये श्रृंगार किया और दर्पण दिखाया।


सासु माँ ने कहा था की दर्पण मेँ ठाकुर जी का हस्ता हुआ देखकर ही राजभोग लगाना।


दर्पण मेँ ठाकुर जी का हस्ता हुआ मुख न देखकर बहु को बड़ा आशर्चय हुआ।


बहू ने विचार किया शायद मुझसे सेवा मेँ कही कोई गलती हो गई हैँ तभी दर्पण मे ठाकुर जी का हस्ता हुआ मुख नहीँ दिख रहा।


बहू ने फिर से ठाकुर जी को नहलाया श्रृंगार किया दर्पण दिखाया।

लेकिन ठाकुर जी का हस्ता हुआ मुख नहीँ दिखा।


बहू ने फिर विचार किया की शायद फिर से कुछ गलती हो गई।

बहु ने फिर से ठाकुर जी को नहलाया श्रृंगार किया दर्पण दिखाया।


जब ठाकुर जी का हस्ता हुआ मुख नही दिखा बहू ने फिर से ठाकुर जी को नहलाया ।


ऐसे करते करते बहू ने ठाकुर जी को 12 बार स्नान किया।

हर बार दर्पण दिखाया मगर ठाकुर जी का हस्ता हुआ मुख नहीँ दिखा।


अब बहू ने 13वी बार फिर से ठाकुर जी को नहलाने की तैयारी की।


अब ठाकुर जी ने विचार किया की जो इसको हँसता हुआ मुख नही दिखा तो ये तो आज पूरा दिन नहलाती रहेगी।


अब बहू ने ठाकुर जी को नहलाया कपड़े पहनाये श्रृंगार किया और दर्पण दिखाया।


अब बहू ने जैसे ही ठाकुर जी को दर्पण दिखाया तो ठाकुर जी अपनी मनमोहनी मंद मंद मुस्कान से हंसे।

बहू को संतोष हुआ कि अब ठाकुर जी ने मेरी सेवा स्वीकार करी।


अब यह रोज का नियम बन गया ठाकुर जी रोज हंसते।

सेवा करते करते अब तो ऐसा हो गया के बहू जब भी ठाकुर जी के कमरे मे जाती बहू को देखकर ठाकुर जी हँसने लगते।


कुछ समय बाद सासु माँ वापस आ गई।

सासु माँ ने ठाकुर जी से कहा की प्रभु क्षमा करना अगर बहू से आपकी सेवा मेँ कोई कमी रह गई हो तो अब मैँ आ गई हूँ आपकी सेवा पूजा बड़े ध्यान से करुंगी।


तभी सासु माँ ने देखा कि ठाकुर जी हंसे और बोले की मैय्या आपकी सेवा भाव मेँ कोई कमी नहीँ हैँ आप बहुत सुंदर सेवा करती हैँ लेकिन मैय्या दर्पण दिखाने की सेवा तो आपकी बहू से ही करवानी है... 

इस बहाने मेँ हँस तो लेता हूँ ।

निश्छल सेवा भाव से प्रभु भी प्रफुल्लित होते है।


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बाबा जी गये चोरी करने

एक बाबा जी एक दिन अपने आश्रम से चले गंगा जी नहाने| बाबा जी धोखे से आधी रात को ही निकल पड़े थे| रास्ते में उनको चोरों का एक दल मिला| चोरों ने बाबा जी से कहा – ‘या तो हमारे साथ चोरी करने चलो, नहीं तो मार डालेंगे|’


बेचारे बाबाजी क्या करते, उनके साथ हो लिये| चोरों ने एक अच्छे-से घर में सेंध लगायी| एक चोर बाहर रहा और सब भीतर गये| साधु बाबा को भी वे लोग भीतर ले गये| चोर तो लगे संदूक ढूंढने, तिजोरी तोड़ने| बाबा जीने देखा कि एक ओर सिंहासन पर ठाकुर जी विराजमान हैं| उन्होंने सोचा – ‘आ गये हैं तो हम भी कुछ करें| 


यह ठाकुर जी की पूजा करने बैठ गये|’ बाबा जीने चन्दन घिसा| धूपबत्ती ठीक की और लगे इधर-उधर भोग ढूंढने| वहाँ कुछ प्रसाद था नहीं| सोचा, ठाकुर जीके जागने पर कोई सती-सेवक आ जायगा तो उससे भोग मँगा लेंगे| ठाकुर जी तो रेशमी दुपट्टा ताने सो रहे थे| पूजा के लिये उनको जगाना आवश्यक था| बाबा जीने उठाया शंख और लगे ‘धूतूधू’ करने|


ठाकुर जी तो पता नहीं जगे या नहीं, पर घर के सब सोये लोग चौंककर जाग पड़े| सब चोर सिरपर पैर रखकर भाग खड़े हुए| घर के लोगों ने दौड़कर बाबा जी को पकड़ा| बाबा जीने कहा – 


‘चिल्लाओ मत| ठाकुर जी को भोग लगाने के लिये कुछ दौड़कर ले आओ, तबतक मैं पूजा करता हूँ| पूजा हो जायगी, तब तुम सबको प्रसाद दूँगा और उन चोरों को भी दूँगा जो सब सेंध लगाकर मेरे साथ इस घर में आ गये हैं| जाओ, जल्दी करो|’ घर के लोगों को बड़ा आश्चर्य हुआ| पूछने पर सब बातों का पता लगा| तब एक स्त्री ने हँसते हुए बाबा जी के पास ठाकुर जी को भोग लगाने के लिये बहुत-से पेड़े लाकर रख दिये| उस समय एक वृद्ध यह गा रहे थे –



एक बार एक राजा भोजन कर रहा था, अचानक खाना परोस रहे सेवक के हाथ से थोड़ी सी सब्जी राजा के कपड़ों पर छलक गई। राजा की त्यौरियां चढ़ गयीं।


जब सेवक ने यह देखा तो वह थोड़ा घबराया, लेकिन कुछ सोचकर उसने प्याले की बची सारी सब्जी भी राजा के कपड़ों पर उड़ेल दी। अब तो राजा के क्रोध की सीमा न रही। उसने सेवक से पूछा, 'तुमने ऐसा करने का दुस्साहस कैसे किया?


सेवक ने अत्यंत शांत भाव से उत्तर दिया, महाराज ! पहले आपका गुस्सा देखकर मैनें समझ लिया था कि अब जान नहीं बचेगी। लेकिन फिर सोचा कि लोग कहेंगे की राजा ने छोटी सी गलती पर एक बेगुनाह को मौत की सजा दी। ऐसे में आपकी बदनामी होती। तब मैनें सोचा कि सारी सब्जी ही उड़ेल दूं। ताकि दुनिया आपको बदनाम न करे। और मुझे ही अपराधी समझे।


राजा को उसके जबाव में एक गंभीर संदेश के दर्शन हुए और पता चला कि सेवक भाव कितना कठिन है। जो समर्पित भाव से सेवा करता है उससे कभी गलती भी हो सकती है फिर चाहे वह सेवक हो, मित्र हो, या परिवार का कोई सदस्य, ऐसे समर्पित लोगों की गलतियों पर नाराज न होकर उनके प्रेम व समर्पण का सम्मान करना चाहिए।



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एक बार एक मंदिर का निर्माण हो रहा था,मूर्तिकार को भगवान की मूर्ति बनानी थी सो वह पत्थर की तलाश में निकला,पास ही नदी किनारे उसे दो पत्थर दिखाई दिये,उसने उन पत्थरों से कहा कि मेरे साथ चलो मैं तुम्हारा जीवन बदल दूंगा,तुमको भगवान बनाऊंगा।

-उस से क्या होगा पत्थरों ने पूछा?


उससे आपको सब कुछ मिलेगा, ढेर सारा सम्मान मिलेगा, क्या अमीर क्या गरीब राजा रंक सभी लोग तुम्हारे सामने हाथ जोड़े खड़े रहेंगे।

-अरे वाह फिर तो बना दो,पर कैसे बनाओगे?

-आपके ऊपर छेनी हथौड़ी चलाऊंगा, काट काट करूंगा कुछ दिनों बाद तुम्हारा ट्रांसफार्मेशन हो जाएगा और तुम पत्थर से भगवान बन जाओगे।

 - अरे नहीं नहीं,मुझे दर्द नहीं झेलना,मैं यहीं पड़ा ठीक-ठाक हूं, पहले पत्थर ने मना कर दिया पर दूसरे पत्थर ने विचार किया कि जीवन में कुछ बड़ा बनना है तो दर्द तो सहना ही पड़ेगा सो वह तैयार हो गया ।

 काम शुरू हो गया दूसरा पत्थर उसका मजाक उड़ाता था यह चुपचाप दर्द सहता था।कुछ ही दिनों में मूर्तिकार ने उससे एक भव्य प्रतिमा बनाई और मंदिर में लगा दी, अगले दिन मंदिर का उद्घाटन था तभी आयोजकों को याद आया कि  लोग नारियल कहां फोड़ेंगे, कोई पत्थर तो है ही नहीं,लोग भागे भागे गए और उसी पत्थर को जिसने मार खाने से इंकार कर दिया था , उसे ले आये। लोग आज तक उसपर पटक पटक कर नारियल फोड़ रहे हैं,पहला पत्थर सम्मान पा रहा है दूसरा मार खा रहा है।


 मनुष्य जीवन में जो कुछ भी है वह सिर्फ और सिर्फ अपने फैसलों की वजह से ही है । पहले पत्थर ने कड़ा फैसला लिया संघर्ष किया और आज सुख का जीवन जी रहा है।

दूसरे पत्थर ने कंफर्ट जोन को प्राथमिकता दी और आज तक मार खा रहा है।

 यही फैसला हम सबको करना है कुछ दिन कंफर्ट जोन का त्याग करके संघर्ष करके आगे बढ़ना है और सुख का जीवन व्यतीत करना है या अभी कंफर्ट जोन में रहकर आगे जीवन भर संघर्ष में रहना है।


मर्जी आपकी क्योंकि जीवन आपका है 


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भाई-बहनों भगवान् शिव से बड़ा कोई श्री विष्णु का भक्त नहीं और भगवान् विष्णु से बड़ा कोई श्री शिव का भक्त नहीं है, इसलिये भगवान् शिव सबसे बड़े वैष्णव और भगवान विष्णु सबसे बड़े शैव कहलाते हैं, नौ साल के छोटे बाल रूप में जब श्री कृष्ण ने महा रास का उद्घोष किया तो वृन्दावन में पूरे ब्रह्माण्ड के तपस्वी प्राणियों में भयंकर हल चल मच गयी की काश हमें भी इस महा रास में शामिल होने का मौका मिल जाय।


दूर दूर से गोपियाँ जो की पूर्व जन्म में एक से बढ़कर एक ऋषि, मुनि, तपस्वी, योगी, भक्त थे, महा रास में शामिल होने के लिए आतुरता से दौड़ें आये, महा रास में शामिल होने वालों की योग्यता को परखने की जिम्मेदारी थी श्री ललिता सखी की, जो स्वयं श्री राधाजी की प्राण प्रिय सखी थीं और उन्ही की स्वरूपा भी थीं।


सज्जनों, हमेशा एकान्त में रहकर कठोर तपस्या करने वाले भगवान् शिव को जब पता चला की श्री कृष्ण महा रास शुरू करने जा रहें हैं तो वो भी अत्यन्त खुश होकर, तुरन्त अपनी तपस्या छोड़ पहुंचे श्री वृन्दावन धाम और बड़े आराम से सभी गोपियों के साथ रास स्थल में प्रवेश करने लगे, पर द्वार पर ही उन्हें श्री ललिता सखी ने रोक दिया और बोली की हे महा प्रभु, रास में सम्मिलित होने के लिए स्त्रीत्व जरूरी है।


तब भोलेनाथ ने तुरन्त कहा की ठीक है तो हमें स्त्री बना दो, तब ललिता सखी ने भोले नाथ का गोपी वेश में श्रृंगार किया और उनके कान में श्री राधा कृष्ण के युगल मन्त्र की दीक्षा दी, चूँकि भोलेनाथ के सिर की जटा और दाढ़ी मूंछ बड़ी बड़ी थी इसलिए ललिता सखी ने उनके सिर पर बड़ा सा घूँघट डाल दिया जिससे किसी को उनकी दाढ़ी मूँछ दिखायी न दे।


महादेव भोलेनाथ के अति बलिष्ठ और बेहद लम्बे चौड़े शरीर की वजह से वो सब गोपियों से एकदम अलग और विचित्र गोपी लग रहे थे जिसकी वजह से हर गोपी उनको बड़े आश्चर्य से देख रही थी, महादेव को लगा की कहीं श्री कृष्ण उन्हें पहचान ना लें इसलिये वो सारी गोपियों की भीड़ में सबसे पीछे जा कर खड़े हो गये।


अब श्री कृष्ण भी ठहरे मजाकिया स्वाभाव के और उन्हें पता तो चल ही चुका था की स्वयं भोले भण्डारी यहाँ पधार चुके हैं तब उन्होंने विनोद लेने के लिये कहा कि महा रास सबसे पीछे से शुरू किया जायेगा, इतना सुनते ही भोलेनाथ घबराये और घूँघट में ही दौड़ते दौड़ते सबसे आगे आकर खड़े हो गये, पर जैसे ही वो आगे आये वैसे ही श्री कृष्ण ने कहा की अब महा रास सबसे आगे से शुरू होगा।


तब महा देव फिर दौड़ कर पीछे पहुचें तो श्री कृष्ण ने फिर कहा रास पीछे से शुरू होगा तब महादेव फिर दौड़ कर आगे आये, इस तरह कुछ देर तक ऐसे ही आगे-पीछे चलता रहा और बाकी की सभी गोपियाँ आश्चर्य से खड़े होकर श्री कृष्ण और श्री महादेव के बीच की लीला देख रही थी।


और ये सोच रही थी की ये कौन सी गोपी है जो डील डौल से तो भारी भरकम है, पर बार बार शर्मा कर कभी आगे भाग रही है तो कभी पीछे और, जैसे लग रहा है श्री कृष्ण भी इसको जानबूझकर हैरान करने के लिए बार बार आगे पीछे का नाम ले रहें हों, कुछ देर बाद श्री कृष्ण ने कहा कि महा रास सबसे पहले इस चंचल गोपी से शुरू होगा जो स्थिर बैठ ही नहीं रही है।


यह कहकर श्री कृष्ण ने भोले नाथ का घूंघट हटा दिया और आनन्द से उद्घोष किया, “आओ गोपेश्वर महादेव! आपका इस महारास में स्वागत हैं, और उसके बाद जो महा उत्सव ऐसा हुआ की ऋषि-महर्षि भी हाथ जोड़कर नेति-नेति कहते रहे, इस महारास के महा सुख को शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता है, तब से आज तक भगवान् शिवशंकर वृन्दावन में गोपेश्वर रूप में ही निवास करते हैं।


वृन्दावन के गोपेश्वर महादेव मन्दिर में जहाँ उनका रोज शाम को गोपी रूप में नित्य रास के लिये श्रृंगार किया जाता है,भाई-बहनों, श्री गोपेश्वर महादेव का दर्शन और इनकी इस कथा का चिन्तन करने से श्री कृष्ण की भक्ति में प्रगाढ़ता आती है और इस कलियुग में भक्ति ही वो सबसे सुलभ तरीका है जो इस लोक के साथ परलोक में भी सुख प्रदान करता हैं।

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रिश्ते  नाते मृत्यु के साथ मिट जाते है

एक बार देवर्षि नारद अपने शिष्य तुम्बरू के साथ कहीं जा रहे थे। गर्मियों के दिन थे। एक प्याऊ से उन्होंने पानी पिया और पीपल के पेड़ की छाया में जा बैठे। इतने में एक कसाई वहाँ से 25-30 बकरों को लेकर गुजरा। उसमें से एक बकरा एक दुकान पर चढ़कर मोठ खाने लपक पड़ा। उस दुकान पर नाम लिखा था - 'शगालचंद सेठ।' दुकानदार का बकरे पर ध्यान जाते ही उसने बकरे के कान पकड़कर दो-चार घूँसे मार दिये। बकरा 'बैंऽऽऽ.... बैंऽऽऽ...' करने लगा और उसके मुँह में से सारे मोठ गिर पड़े।


           🔸फिर कसाई को बकरा पकड़ाते हुए कहाः "जब इस बकरे को तू हलाल करेगा तो इसकी मुंडी मेरे को देना क्योंकि यह मेरे मोठ खा गया है।"


      देवर्षि नारद ने जरा-सा ध्यान लगाकर देखा और जोर-से हँस पड़े। तुम्बरू पूछने लगाः "गुरुजी ! आप क्यों हँसे? उस बकरे को जब घूँसे पड़ रहे थे तब तो आप दुःखी हो गये थे, किंतु ध्यान करने के बाद आप हँस पड़े। इसमें क्या रहस्य है?"


      नारद जी ने कहाः "छोड़ो भी.... यह तो सब कर्मों का फल है, छोड़ो।"


      "नहीं गुरुजी ! कृपा करके बताइये।"


             इस दुकान पर जो नाम लिखा है 'शगालचंद सेठ' - वह शगालचंद सेठ स्वयं यह बकरा होकर आया है। यह दुकानदार शगालचंद सेठ का ही पुत्र है। सेठ मरकर बकरा हुआ है और इस दुकान से अना पुराना सम्बन्ध समझकर इस पर मोठ खाने गया। उसके बेटे ने ही उसको मारकर भगा दिया। मैंने देखा कि 30 बकरों में से कोई दुकान पर नहीं गया फिर यह क्यों गया कमबख्त? इसलिए ध्यान करके देखा तो पता चला कि इसका पुराना सम्बंध था।


            जिस बेटे के लिए शगालचंद सेठ ने इतना कमाया था, वही बेटा मोठ के चार दाने भी नहीं खाने देता और गलती से खा लिये हैं तो मुंडी माँग रहा है बाप की। इसलिए कर्म की गति और मनुष्य के मोह पर मुझे हँसी  आ रही हैं कि अपने - अपने कर्मों का फल को प्रत्येक प्राणी को भोगना ही पड़ता है और इस जन्म के रिश्ते - नाते मृत्यु के साथ ही मिट जाते हैं, कोई काम नहीं आता।"


#लालच_से_पर्याप्त_दूरी_आवश्यक_है! 

एक #सेठ बर्तनों को किराए पर देने का व्यवसाय करता था । एक बार उसने किसी व्यक्ति को किराये पर बर्तन दिये। वह इन्सान उससे बर्तन ले गया और किराया दे गया लेकिन जब उसने बर्तन वापस लौटाये तो दो-तीन बर्तन उसे #फालतू दे दिये। बर्तनों की अधिक संख्या देखकर सेठ ने पूछा- "क्या बात है? तुमने ज्यादा बर्तन क्यों दिये हैं?"


सेठ की बात सुनकर उस आदमी ने कहा-" आपने जो बर्तन दिये थे, ये बर्तन उसकी #सन्तानें है इसलिए इन्हें भी आप संभाल लीजिए।" 


सुनकर सेठ बहुत खुश हुआ कि यह अच्छा #ग्राहक है। यह तो मुझे बहुत फायदा देगा। किराया तो मुझे मिलेगा ही, साथ में फालतू बर्तन भी मिलेंगे। इस तरह चन्द दिन बीते, वही आदमी फिर आ गया। लौटते समय फिर थोड़े बर्तन ज्यादा कर दिये और वही बात कही कि बर्तनों की सन्तान हुई है। सेठ बड़ा खुश हुआ, चुपचाप सब बर्तन रख लिए।


एक महीने का समय बीतने के बाद वह आदमी सेठ के पास फिर गया और कहने लगा कि मेरे यहां कुछ खास मेहमान आने वाले हैं, अतः कृपा करके आपके पास जो #चांदी के बर्तन हैं, वे मुझे दे दीजिए। पहले तो सेठ कुछ सोच में पड़ा, फिर सोचा कि मैंने पहले जितने बर्तन दिए उनसे ज्यादा मुझे हासिल हुए हैं। इस बार कुछ चांदी के बर्तन ज्यादा मिलेंगे। यही सोचकर उसने बर्तन दे दिये। समय बीतता गया, पर वह आदमी बर्तन लौटाने नहीं आया। अब सेठ बहुत परेशान हुआ। वह उस आदमी के घर जा पहुंचा और उससे पूछा-"भले मानस! तूने वे बर्तन वापस नहीं किए।" वह आदमी बहुत ही मायूस सा होकर बोला-"सेठ जी, क्या करें, आपने जो चांदी के बर्तन दिए थे उनकी तो #मौत हो गई।"


उस व्यक्ति की बात सुनकर सेठ को बहुत गुस्सा आया, कहने लगा -"क्या बात है, मुझे बेवकूफ समझा है क्या? मैं तुझे अन्दर करवा दूंगा। कभी बर्तनों की भी मौत होती है?"


वह आदमी कहने लगा- "सेठ जी! जब मैंने कहा था कि बर्तनों की संतानें हो रही हैं, उस वक्त आप सब ठीक मान रहे थे। यदि बर्तनों की #सन्तान हो सकती है तो वे #मर क्यों नहीं सकते?"


अब निरुत्तर होने की बारी सेठ की थी।इसी तरह संसार की हालत है। माया के पीछे इन्सान इतना अन्धा हो जाता है कि उसे कुछ समझ नहीं आता। भक्तजन हर कदम पर इन्सान को चेतावनी देते हैं कि हे इन्सान! तू जिन महात्माओं के, जिन सन्तजनों के वचनों को सुनता है, पढ़ता है, तू इनके ऊपर सत्य को जानकर दृढ़ भी हो जा ।लालच में पड़कर सत्य का साथ न छोड़, नहीं तो बाद में पछताना ही पड़ेगा।



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#हे_कृष्ण_गोविन्द_हरे_मुरारी_हे_नाथ_नारायण_वासुदेवा!

#जय_श्री_राधे_राधे!


श्री कृष्णा जी पर अटूट विश्वास की कहानी... 👌👌🙏🙏


एक वृद्ध महिला एक सब्जी की दुकान पर जाती है,उसके पास सब्जी खरीदने के पैसे नहीं होते है।*


*वो दुकानदार से प्रार्थना करती है कि उसे सब्जी उधार दे दे पर दुकानदार मना कर देता है।*


*उसके बार-बार आग्रह करने पर दुकानदार खीज कर कहता है, तुम्हारे पास कुछ ऐसा है , जिसकी कोई कीमत हो , तो उसे इस तराजू पर रख दो,  मैं उसके वज़न के बराबर सब्जी तुम्हे दे दूंगा।*


*वृद्ध महिला कुछ देर सोच में पड़ जाती है।*

*क्योंकि उसके पास ऐसा कुछ भी नहीं था।*


*कुछ देर सोचने के बाद वह, एक मुड़ा-तुड़ा कागज़ का टुकड़ा निकलती है और उस पर कुछ लिख कर तराजू पर रख देती है।*


*दुकानदार ये देख कर हंसने लगता है।*

*फिर भी वह थोड़ी सब्जी उठाकर तराजू पर रखता है।*

*आश्चर्य...!!!*

*कागज़ वाला पलड़ा नीचे रहता है और सब्जी वाला ऊपर उठ जाता है।*


*इस तरह वो और सब्जी रखता जाता है पर कागज़ वाला पलड़ा नीचे नहीं होता।*


*तंग आकर दुकानदार उस कागज़ को उठा कर पढता है और हैरान रह जाता है *


*🌹🌹 कागज़ पर लिखा था...''हे श्री कृष्ण, तुम सर्वज्ञ हो, अब सब कुछ तुम्हारे हाथ में है''..


*दुकानदार को अपनी आँखों पर यकीन नहीं हो रहा था।*


*वो उतनी सब्जी वृद्ध महिला को दे देता है।*


*पास खड़ा एक अन्य ग्राहक दुकानदार को समझाता है, कि दोस्त, आश्चर्य मत करो।*


*केवल श्री कृष्ण ही जानते हैं की प्रार्थना का क्या मोल होता है।*


*वास्तव में प्रार्थना में बहुत शक्ति होती है।*

*चाहे वो एक घंटे की हो या एक मिनट की।*

*यदि सच्चे मन से की जाये, तो ईश्वर अवश्य सहायता करते हैं..!!* 


*अक्सर लोगों के पास ये बहाना होता है, की हमारे पास वक्त नहीं।*


*मगर सच तो ये है कि ईश्वर को याद करने का कोई समय नहीं होता...!!* 


*🌹🌹प्रार्थना के द्वारा मन के विकार दूर होते हैं, और एक सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।*


*🌹🌹जीवन की कठिनाइयों का सामना करने का बल मिलता है।*


*🌹🌹ज़रूरी नहीं की कुछ मांगने के लिए ही प्रार्थना की जाये।*


*🌹🌹जो आपके पास है उसका धन्यवाद करना चाहिए।*


*🌹🌹इससे आपके अन्दर का अहम् नष्ट होगा और एक कहीं अधिक समर्थ व्यक्तित्व का निर्माण होगा।*


*🌹🌹प्रार्थना करते समय मन को ईर्ष्या,द्वेष,क्रोध घृणा जैसे विकारों से मुक्त रखें..!!*

   *🙏🙏🏻🙏🏾जय जय श्री राधे*🙏🏿🙏🏽🙏🏼





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